जैन धर्म से एसएससी, आरआरबी तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बहुत से प्रश्न पूछें जाते हैं। इस आर्टिकल में जैन धर्म क्या है तथा उसकी सम्पूर्ण जानकारी को विस्तार से समझाया गया है जो Exam के Piont of View से काफी महत्वपूर्ण है।

जैन धर्म क्या है
जैन धर्म एक प्राचीन धर्म और दर्शन है जो सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य और ब्रह्मचर्य के सिद्धांतों पर आधारित है। जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव में चेतना या आत्मा विद्यमान है और कर्मों के कारण आत्मा संसार के जन्म-मरण के चक्र में बंधी रहती है। और इसका मुख्य उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति है। यह धर्म मुख्य रूप से भारत में प्रचलित है
जैन धर्म की उत्पत्ति
जैन परंपरा के अनुसार जैन धर्म अत्यंत प्राचीन है और इसके इतिहास में 24 तीर्थंकरों का विशेष महत्व है। तीर्थंकर वे महान आध्यात्मिक पुरुष माने जाते हैं जिन्होंने संसार के बंधनों से मुक्ति प्राप्त की और अन्य लोगों को भी मोक्ष का मार्ग बताया।
इस धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे, जिन्होंने जैन धर्म की स्थापना की और समाज को व्यवस्थित जीवन जीने की शिक्षा दी।
महावीर स्वामी ने जैन धर्म के सिद्धांतों को व्यापक रूप से प्रचारित किया और अनुयायियों को अहिंसा और तपस्या का मार्ग दिखाया। इसके साथ ही जैन धर्म के सिद्धांतों का विस्तार भी किया था। महावीर स्वामी जैन धर्म के 24 वें तथा अंतिम तीर्थंकर हुए इन्हें इस धर्म का वास्तविक संस्थापक भी माना जाता है।
जैन धर्म के 24 तीर्थंकर
जैन धर्म के सभी 24 तीर्थंकरों के नाम क्रम से दिए गए हैं –
| क्रम | तीर्थंकर | क्रम | तीर्थंकर |
|---|---|---|---|
| 1 | ऋषभदेव | 13 | विमलनाथ |
| 2 | अजितनाथ | 14 | अनंतनाथ |
| 3 | संभवनाथ | 15 | धर्मनाथ |
| 4 | अभिनंदननाथ | 16 | शांतिनाथ |
| 5 | सुमितिनाथ | 17 | कुंथुनाथ |
| 6 | पद्मप्रभ | 18 | अरनाथ |
| 7 | सुपार्श्वनाथ | 19 | मल्लिनाथ |
| 8 | चंद्रप्रभ | 20 | मुनिसुव्रत |
| 9 | पुष्पदंत | 21 | नमिनाथ |
| 10 | शीतलनाथ | 22 | नेमिनाथ |
| 11 | श्रेयांसनाथ | 23 | पार्श्वनाथ |
| 12 | वासुपूज्य | 24 | महावीर स्वामी |
महावीर स्वामी का जीवन
महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था। स्वामी का जन्म 540 ई.पू. वैशाली के कुंडग्राम में हुआ था। यह क्षेत्र वर्तमान बिहार में स्थित था। उनके पिता का नाम सिद्धार्थ था जो ज्ञातृक कुल के कबीले से संबंधित थे तथा माता त्रिशला (लिछवि राजा चेतक की बहन) थीं।
गृहत्याग एवं ज्ञान प्राप्ति
महावीर स्वामी जी ने लगभग 30 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया और सत्य और ज्ञान की खोज में तपस्या का मार्ग अपनाया।
12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद समग्र नामक किसान के खलिहान में ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे 42 वर्ष की आयु में ज्ञान प्राप्त हुआ था।
ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्हें “जिन” कहा गया, जिसका अर्थ है ऐसा विजेता जिसने अपने भीतर के राग, द्वेष और अन्य आसक्तियों पर विजय प्राप्त कर ली हो।
जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत
1.अहिंसा
“अहिंसा जैन धर्म का सबसे प्रमुख सिद्धांत है।”
इसका अर्थ है किसी भी प्राणी को शारीरिक, मानसिक या वाणी से हानि न पहुँचाना। जैन दर्शन में केवल मनुष्य को नुकसान पहुँचाने से बचना ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि सभी प्रकार के जीवों के प्रति सावधानी और करुणा रखने पर बल दिया जाता है।
2.सत्य
सत्य बोलना और किसी भी प्रकार के झूठ से बचना जैन धर्म का महत्वपूर्ण सिद्धांत है। व्यक्ति को ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए जिससे किसी जीव को अनावश्यक नुकसान पहुँचे।
3. अस्तेय
अस्तेय का अर्थ है जो वस्तु स्वयं की नहीं है उसे बिना अनुमति ग्रहण न करना।
व्यक्ति को चोरी, धोखाधड़ी या अनुचित तरीके से किसी दूसरे की वस्तु प्राप्त करने से बचना चाहिए।
4. ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्य का अर्थ इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण से जुड़ा है। जैन साधु-साध्वियों के लिए यह कठोर संयम का हिस्सा है। गृहस्थों के लिए भी जैन धर्म संयमित और नैतिक जीवन पर बल देता है।
5. अपरिग्रह
सांसारिक मोह-माया से दूर रहना और आवश्यकता से अधिक धन, वस्त्र या भौतिक सुखों का संग्रह न करना जैन धर्म में विशेष रूप से बताया गया है।
पंच महाव्रत
जैन साधुओं और साध्वियों के लिए पाँच प्रमुख महाव्रत बताए गए हैं:
- अहिंसा – किसी जीव को हिंसा न पहुँचाना
- सत्य – असत्य से बचना
- अस्तेय – चोरी न करना
- ब्रह्मचर्य – इंद्रिय संयम रखना
- अपरिग्रह – संग्रह और आसक्ति का त्याग करना
इन पाँचों को जैन नैतिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
जैन धर्म के त्रिरत्न
जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को समझाने के लिए त्रिरत्न की अवधारणा महत्वपूर्ण है।
1. सम्यक दर्शन
वास्तविकता और जैन सिद्धांतों में उचित श्रद्धा रखना सम्यक दर्शन कहलाता है।
2. सम्यक ज्ञान
वस्तुओं और जीवन के वास्तविक स्वरूप का सही ज्ञान प्राप्त करना सम्यक ज्ञान है।
3. सम्यक चरित्र
सही ज्ञान और विश्वास के अनुसार अपने जीवन में उचित आचरण करना सम्यक चरित्र कहलाता है।
जैन दर्शन में इन तीनों को मिलकर मोक्ष का मार्ग माना गया है।
जैन धर्म के प्रमुख ग्रंथ
जैन धर्म के प्रमुख ग्रंथों को ‘आगम’ कहा जाता है। ये ग्रंथ मुख्य रूप से भगवान महावीर के उपदेशों पर आधारित हैं। आगम ग्रंथ श्वेतांबर जैन परंपरा में विशेष महत्व रखते हैं।
जैन संगीतियाँ
| विवरण | प्रथम जैन संगीति | द्वितीय जैन संगीति |
|---|---|---|
| समय | 310 ईसा पूर्व | 512 ईस्वी |
| शासनकाल | चन्द्रगुप्त मौर्य | मैत्रक वंश |
| स्थान | पाटलिपुत्र | बल्लभी (गुजरात) |
| अध्यक्ष | स्थूलभद्र द्वारा | देवर्धी क्षमाश्रमण |
पहली जैन संगीति में जैन धर्म दो भागों में बँट गया – श्वेतांबर और दिगम्बर।
जैन धर्म के प्रमुख संप्रदाय
1. दिगंबर
दिगंबर परंपरा में कठोर तप और त्याग को विशेष महत्व दिया गया है। दिगंबर साधु सांसारिक वस्तुओं के पूर्ण त्याग को आदर्श मानते हैं। इस संप्रदाय का नेतृत्व भद्रबाहु ने किया था।
2. श्वेतांबर
श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी सफेद वस्त्र धारण करते हैं। इस संप्रदाय में धार्मिक ग्रंथों और मठवासी जीवन की अलग परंपराएँ विकसित हुईं। इसक नेतृत्व स्थूलभद्र द्वारा किया गया।
दोनों संप्रदाय जैन धर्म के मूल सिद्धांतों जैसे अहिंसा, कर्म, आत्मा और मोक्ष को महत्वपूर्ण मानते हैं, हालांकि कुछ धार्मिक मान्यताओं और ग्रंथों को लेकर दोनों के बीच अंतर है।
जैन धर्म और बौद्ध धर्म में अंतर
जैन धर्म और बौद्ध धर्म दोनों का विकास प्राचीन भारत में हुआ और दोनों ने उस समय की धार्मिक तथा दार्शनिक बहसों को प्रभावित किया। दोनों में अहिंसा, संयम और कर्म जैसे विषय महत्वपूर्ण हैं, लेकिन दोनों की दार्शनिक मान्यताएँ समान नहीं हैं।
जैन धर्म आत्मा को स्वीकार करता है, जबकि बौद्ध दर्शन में स्थायी आत्मा की अवधारणा को स्वीकार नहीं किया जाता।
जैन धर्म में अत्यंत कठोर तपस्या की परंपरा विकसित हुई, जबकि बौद्ध धर्म ने मध्यम मार्ग पर बल दिया।
इस प्रकार दोनों धर्मों में कुछ समान नैतिक शिक्षाएँ होने के बावजूद उनके दार्शनिक आधार अलग-अलग हैं।
महत्वपूर्ण बिन्दु (Important Points)
- जैन धर्म के संस्थापक व पहले तीर्थंकर आचार्य ऋषभदेव थे।
- जैन आचार्य ऋषभदेव का प्रतीक – बैल था।
- इनका जन्म आयोध्य में हुआ था।
- इनके पुत्र “बाहुबली या गोमतेश्वर” की प्रतिमा कर्नाटक के श्रवणवेलगोला में स्थापित की गई है।
- ऋषभदेव को वृषभनाथ, ऋषभनाथ, आदिनाथ, आदिदेव के नाम से भी जाना जाता है।
- 23वें तीर्थंकर – पार्श्वनाथ जी थे।
- पार्श्वनाथ का प्रतीक – सर्प था।
- इनका जन्म वाराणसी में हुआ था।
- पार्श्वनाथ ने 100 वर्ष की आयु में सम्मेद पर्वत पर निर्वाण प्राप्त किया।
- जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक – महावीर स्वामी थे।
- जैन धर्म के अंतिम और 24वें तीर्थंकर – महावीर स्वामी थे।
- महावीर स्वामी का प्रतीक “सिंह” था।
- महावीर स्वामी का जन्म 540 ई.पू. कुण्डग्राम (वैशाली) में हुआ था।
- महावीर स्वामी मृत्यु पावापुरी में हुई थी।
- महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था।
- महावीर स्वामी ने अपना पहला उपदेश पावापुरी में दिया था।
- महावीर स्वामी को 42 वर्ष की आयु साल वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था।
निष्कर्ष
जैन धर्म क्या है,जैन धर्म न केवल एक धार्मिक संघ है बल्कि यह एक नैतिक और आध्यात्मिक जीवन जीने का मार्ग भी प्रदान करता है। इसकी शिक्षाएँ अहिंसा, करुणा, और आत्मसंयम पर आधारित हैं, जो न केवल व्यक्ति के आत्मिक उत्थान में सहायक हैं, बल्कि संपूर्ण समाज के कल्याण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
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